हिंदी कविताएँ भाग 2 - Hindi Poems Part 2

हिंदी कविताएँ भाग 2 - Hindi Poems Part 2, इसमें हिन्दी भाषा की कविताएँ सम्मिलित की गई हैं जिसमें अलग अलग मूड की कुल दस कविताएँ शामिल की गई हैं।

Hindi Poems Part 2

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1. मेरी कमियाँ बताने वाले हिंदी कविता


मेरी कमियाँ बताने वाले, मेरी खूबियाँ भी बताते तो कोई बात होती
गैरों को बताना ठीक नहीं था, मुझको बताते तो कोई बात होती

अपना दर्द सुनाने वाले, मेरा भी सुनाते तो कोई बात होती
सिक्के का एक पहलू ही दिखाया, दूसरा भी दिखाते तो कोई बात होती

घरेलू बातें दुनिया में बताना गलत है, इस बात को निभाते तो कोई बात होती
दूसरों पर मनमाफिक तोहमत लगाकर, इतना ना गिराते तो कोई बात होती

अपने माता पिता जैसी चिंता, सभी बुजुर्गों के लिए जताते तो कोई बात होती
दूसरे बुजुर्ग भी माँ बाप जैसे हो सकते हैं, अहसास जो कराते तो कोई बात होती

बहू भी बेटी बन सकती है, कभी बनके दिखाते तो कोई बात होती
सभी के साथ अपना रिश्ता, आत्मिक सा बनाते तो कोई बात होती

हैसियत अपने घर की बहुओं की, निष्पक्षता से तौल पाते तो कोई बात होती
बहुएँ तो सिर्फ काम करने के लिए होती है, यह सोच बदल पाते तो कोई बात होती

अपने हिसाब से अपनी जिंदगी जीना गलत नहीं है, कहके दिखाते तो कोई बात होती
अपने लिए इसे जायज और दूसरों के लिए नाजायज, ना ठहराते तो कोई बात होती

उकसाने के बजाये बुजुर्गों को भी, गलती का अहसास कराते तो कोई बात होती
तुम रिश्तों में सेतु बन सकते थे, कभी बनके दिखाते तो कोई बात होती

2. बरगद की छाँव हिंदी कविता


सुना है बरगद की छाँव में शीतलता मिलती है
इसकी शाखाओं पर बहुत से पंछियों की शाम ढलती है
बरगद नहीं पनपने देता दूसरे पेड़ों को अपने साए में
इसके साए में इन्हें तन्हा-तन्हा मृत्यु मिलती है

जब बरगद की दूसरी जड़ें जमीन को छूने लगती है
बरगद से अलग, अपने अस्तित्व को ढूँढने लगती हैं
ये जड़े बरगद के साये वाले पेड़ नहीं है
इन जड़ों से तो बरगद को मजबूती मिलती है

जब बरगद की सारी ताकत कुछ शाखाएँ ले जाती है
जब बरगद की बाकी शाखाएँ मुँह ताकती रह जाती है
झुकने लगता है जब बरगद सिर्फ एक ही तरफ
तब कोई भी शाख अपना अस्तित्व बचा नहीं पाती है

कहते हैं बरगद पर परमात्मा का वास होता है
इसके साये में सुरक्षित होने का आभास होता है
लेकिन अस्तित्व रहता है उसी बरगद का सदियों तक
जिसको अपनी जड़ों में मजबूती का विश्वास होता है

जब बरगद की जड़ों को ताकत का अहसास होता है
जब बरगद की शाखाओं में आपसी विश्वास होता है
तब गुजर जाते हैं पतझड़ और तूफानों के कई मौसम यूँ ही
और इसके घोंसलों का हर एक पंछी खुशहाल होता है

3. जो तुम होती हिंदी कविता


जो तुम होती
पूर्णमासी के चाँद के माफिक
एकटक निहारता रहता तुम्हें
प्यासे चकोर के जानिब।

जो तुम होती
स्निग्ध, शीतल चाँदनी में
दिल से महसूस करता तुम्हें
अपनी साँसों की रागिनी में।

जो तुम होती
समुन्दर की हिलोरे मारती लहर बनकर
किनारे की रेत पर
महसूस करता तुम्हें गंगाजल समझकर।

जो तुम होती
नीर से भरा हुआ एक श्याम वर्णी बादल
मयूर की तरह
पंख फैलाकर नाच-नाच कर हो जाता पागल।

जो तुम होती
दूर समुन्दर के एक जजीरे जैसी खूबसूरत
जब मिलने को दिल चाहता
तुम्हें पुकारता लेकर दीवानी सी सूरत।

जो तुम होती
एक बदली, घनघोर बरसती हुई
समेटता रहता तुम्हें शुष्क रेत में
जो रहती पानी के लिए तरसती हुई।

जो तुम होती
हिमगिरी पर बिखरी श्वेत, कोमल हिम बनकर
दिल की गहराइयों से
तुम्हारी एक मूरत बनाता सिर्फ तुम्हें याद कर।

जो तुम होती
पहाड़ पर टकराती हुई स्वछंद बदली की तरह
अंक में भर लेता तुम्हे
गगनचुम्बी, दृढ़, निश्चयी पहाड़ की तरह।

जो तुम होती
डूबते सूरज की मनमोहक लालिमा बनकर
दूर किसी पेड़ की ओट से
एकटक देखता रहता तुम्हें ओझल होने तक।

जो तुम होती
एक निस्वार्थ जलती हुई शमा की तरह
तुममें समाकर जल जाता
शमा के दीवाने परवाने की तरह।

जो तुम होती
मंद-मंद बहती हुई पुरवाई बयार की तरह
दोनों बाहें फैलाकर
अंक में भरने की कोशिश करता दीवानों की तरह।

जो तुम होती
किसी खिले हुए सुमन की तरह
मैं तुममें ही घुल मिल कर
शामिल रहता तुम्हारी सुगंध की तरह।

जो तुम होती
एक लहराती अधखुली कली बनकर
किसी को तुम्हारे पास
नहीं आने देता भंवरे की तरह गुनगुनाकर।


4. मेरा घर कौनसा है हिंदी कविता


बचपन से यही सुना है कि मैं इस घर में पराई हूँ
मैं तो बिना वजूद की एक नादान परछाई हूँ
मुझे यही भ्रम रहा कि मैं तो घर के कोने कोने में समाई हूँ
कचोटता मन और चिढ़ाते हुए घर को देखकर
दिल यही पूछता है कि मेरा घर कौनसा है?

बचपन में जब भाई के साथ घर में खेलती हूँ
कही अनकही, देखी अनदेखी परिस्थितियाँ झेलती हूँ
मुझे रखा जाता है एक अमानत की तरह संभालकर
अपने आप को एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी के रूप में देखकर
दिल यही पूछता है कि मेरा घर कौनसा है?

खाने पीनें से लेकर पढ़ने लिखने में अंतर
भाई हो जाता है बिना पूछे छूमंतर
मुझे हर जगह जाना पड़ता है पूछकर
हर जगह एक अजीब और छुपा हुआ सा पहरा महसूस कर
दिल यही पूछता है कि मेरा घर कौनसा है?

लड़कपन बीतने लगा और जैसे जैसे उम्र बढ़ने लगी
घरवालों के मन में कई परेशानियाँ भी घर करने लगी
कई लोग सचेत करने लगे हैं कि
बेटी होती है पराया धन और बंद तिजोरी की तरह
यह बात सुनकर और तड़पकर
सीने में एक लम्बी साँस भरकर
दिल यही पूछता है कि मेरा घर कौनसा है?

जैसे जैसे मैं सयानी होने लगी
बंदिशों की एक नई कहानी होने लगी
जमानें की चिंता और पडौसियों का भय बढ़ने लगा
अधछलके आँसूओं से भीगे तकिये में मुँह छुपाकर
दिल यही पूछता है कि मेरा घर कौनसा है?

फिर एक वक्त वो भी आया जब मेरा विवाह हुआ
सबको देखकर ऐसा लगा कि जैसे कर्तव्यों का पूर्ण निर्वाह हुआ
जैसे एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी आज पूरी हुई
“हमें न भूल जाना अपने घर जाकर” ये सुनकर
दिल यही पूछता है कि मेरा घर कौनसा है?

ससुराल में पहुँच कर अपने घर को निहारा
ढूंढने लगी थी अपनापन और सहारा
पीहर जाने पर यही कहा जाता है कि “बहु अपने घर जा रही है”
ये बात सुनकर और समझते हुए नासमझ बनकर
दिल यही पूछता है कि मेरा घर कौनसा है?

शायद औरत का अपना कोई वजूद नहीं होता
तभी तो जन्म से लेकर मृत्यु तक
त्रिशंकु की भाँति पीहर और ससुराल में लटकती रहती हैं
“तेरा घर वो है” यही एक बात बार बार सुनकर
दिल यही पूछता है कि मेरा घर कौनसा है?

जिस घर में बीस पच्चीस साल जब बिताए हों
जहाँ सब एक वृक्ष की अलग अलग शाखाएं हों
फिर वृक्ष के लिए सभी शाखाएं एक समान क्यों नहीं होती
सिर्फ एक प्रकार की शाखा को जिम्मेदारी और पराया धन देखकर
दिल यही पूछता है कि मेरा घर कौनसा है?

5. मेरी याद में आँसू हिंदी कविता


जीते जी जिन्हें मैं फूटी आँख न सुहाया
आज वो मेरी याद में आँसू बहा रहे हैं
जिन्होंने कभी हाथ मिलाने लायक न समझा
आज मुझे वो हाथ पकड़ के नहला रहे हैं।

मचा रहे हैं कोहराम और क्रंदन बनकर रुदाली
जिन्होंने आज तक समझा मुझे आवारा मवाली
समझकर एक बदनुमा दाग मुझको यूँ भुलाया
अपने आँचल की छाँव के लिए बहुत तरसाया।

बड़ी दूर दूर से सारे रिश्तेदार आ रहे हैं
अपनी उपस्थिति की जैसे कोई हाजिरी लगवा रहे हैं
कोई कहता है कि बहुत ही भोला और सीधा सादा था
कोई कहता है कि वो तो घर का एक उजाला था।

लोग बढ़ते गए और मजमा लगता गया
हर तरफ एक ही चर्चा थी कि वो रुखसत हो गया
लोगों के चेहरों पे छाई हुई थी बनावटी उदासी
माहौल में छाई हुई थी एक अजीब सी बदहवासी।

वक्त गुजरने लगा और असलियत उजागर होने लगी
बदहवासी और उदासी न जाने कहा खोने लगी
जो लोग उदास थे वो कोनों में जाकर इकट्ठा होने लगे
मेरे बारे में भूलकर अपनी दुनिया में फिर खोने लगे।

सच है कि झूठ का लबादा ज्यादा टिकता नहीं
पर फिर भी झूठ के सामने सच कभी बिकता नहीं
जो दिखता है वही बिकता है यही दुनिया का दस्तूर है
झूठ को सच साबित करने में अधिकतर सत्य ही मजबूर है।

लो मौसम ने ली अंगड़ाई और लगी बारिश भी होने
जैसे आसमान में घटायें भी लगी हो मैयत में रोने
कोई बोला कि जीते जी कुछ न किया और आज भी भिगो गया
जाते जाते भी ये बारिश की परेशानी खड़ी कर गया।

जो सर्दी में देह त्यागता तो अच्छा होता
कम से कम कोई मौसमी विघ्न तो न पड़ता
कोई कहने लगा कि सर्दी में मरने के कई फायदे है
ठण्ड नहीं लगती और जलती चिता को अलाव समझकर हाथ तापते हैं।

जो बातें जीते जी समझ में न आई वो अब समझ में आ रही हैं
कौन अपना है और कौन पराया है, परिस्थितियाँ सब बतला रही हैं
खुश हूँ ये देखकर कि दिखावा ही सही, मेरे लिए रो तो रहे हैं
दुखी हूँ ये सोचकर कि हम अब चिर निद्रा में सो रहे हैं।

दुखी हूँ ये देखकर कि मेरी वजह से टूटे कई सपने
खुश हूँ ये सोचकर कि जैसे भी हो लेकिन है तो मेरे अपने
जो सम्मान मरने के बाद मिलता है अगर उसका कुछ अंश भी जीते जी मिले
जीवन सफल हो जाये और खुशियों के फूल हर तरफ खिले।

6. मृत्यु शय्या पर लेटे लेटे हिंदी कविता


मृत्यु शय्या पर लेटे लेटे
मन उद्विग्न हो रहा है
मंथन कर रहा है कि जीवन भर
मैंने क्या पाया और क्या खोया
उसका हिसाब लगा रहा है
हिसाब सही नहीं लग पा रहा है
मन भूली बीती बातों को
सही सही नहीं तौल पा रहा है
सुख और दुःख के सारे क्षण
घूम घूम कर सामने आ रहे हैं
न चाहते हुए भी
कातर आँखों से आँसू बहा रहे हैं।

मृत्यु शय्या पर लेटे लेटे
कई हसरतें कई उम्मीदें
मन को व्याकुल कर रही हैं
सोच रहा हूँ कुछ वक्त और मिलता तो
ये भी कर लेता, वो भी कर लेता
पर हसरतें और इच्छाएँ तो, स्वर्ण मृग सदृश्य हैं
जिनका खयाल तो आता है
पूर्ण करने की लालसा होती है
परन्तु कभी पूर्ण नहीं हो पाती
लेकिन फिर भी मन उनके पीछे भागता है।

मृत्यु शय्या पर लेटे लेटे
अभी भी मोह माया के मकड़जाल से
मुक्त नहीं हो पाया हूँ
सोच रहा हूँ अगर कुछ समय और मिल जाता तो
अपना लोक परलोक सुधार लेता
जन्म सफल हो जाता
स्वजनों के लिए कुछ करता
सभी अधूरी तृष्णाओं को पूर्ण कर लेता
लेकिन फिर दिल में खयाल आता है
जब मैं कुछ करने में सक्षम था
तब कुछ भी करने की चाहत न थी
अब जब कुछ नहीं कर सकता
तब बहुत कुछ करना चाहता हूँ
क्या ये कुछ करने का जज्बा अभी पैदा हुआ है
या फिर कर्मों का फल पाने से मन घबरा रहा है क्योंकि
बचपन से सुना था कि चित्रगुप्त कर्मों का लेखा जोखा रखते हैं
जो जैसा कर्म करता है उसी अनुसार फल मिलता है।

मृत्यु शय्या पर लेटे लेटे
चित्त शांत क्यों नहीं है
किस बात की उधेड़बुन है
अकेलेपन का अहसास डरा रहा है
जीवन का खालीपन सता रहा है
जीवन यात्रा अकेले ही पूर्ण करनी होती है
इंसान अकेला ही आता है और अकेला ही जाता है
अब समझ में आया है कि
जीवन तो नश्वर है
इस नश्वर जीवन का केंद्र, सिर्फ और सिर्फ ईश्वर है।

7. अलसुबह की भोर हिंदी कविता


अलसुबह की भोर
रात के अन्धकार को समाप्त कर
नित एक नवीन सन्देश देती है
भरती है एक नई ऊर्जा और जोश मन में
कुछ नया करने को प्रेरित करती है।

अलसुबह की भोर
नए नए प्राकृतिक दृश्यों को जन्म देती है
नवागंतुक दिन को खुशनुमा बनाने के लिए उसकी नींव बनती है
सम्पूर्ण दिवस के लिए नया जुनून और जुझारूपन पैदा करती है
यदा कदा हमें अचंभित भी करती रहती है।

अलसुबह की भोर
मंदिरों में पूजा अर्चना, घंटियों की मनमोहक ध्वनि के माध्यम से
मस्जिदों में अजान और गुरुद्वारों में गुरु वाणी के माध्यम से
सभी का मन श्रद्धा और आस्था से भर कर परमात्मा की निकटता का आभास कराकर
उद्विग्न और व्याकुल चित्त को शांत कर देती है।

अलसुबह की भोर
पंछियों को अपना नीड़ छोड़कर
दानापानी की तलाश में यहाँ वहाँ
उड़ने को मजबूर करती है ताकि वे
अपने बच्चों के लिए भोजन का प्रबंध कर सके।

अलसुबह की भोर
उद्यान में भ्रमण को जाने वालों के दिल को प्रसन्न कर देती है
प्राकृतिक सुन्दरता की अद्भुत छटाओं को जन्म देती है
फूलों, पत्तों और नर्म घास पर निर्मल ओस की बूंदें बिखेरती है
भ्रमर को गुंजन और कोयल को कूकने की प्रेरणा देती है।

अलसुबह की भोर
तितलियों की तरह चंचल महसूस होती है
मयूर के फैले हुए पंखों के रंगों में कृष्ण मुकुट के दर्शन कराती है
मुर्गे की बांग के माध्यम से समय की पाबंदी और शाश्वत कर्म का सन्देश देती है
परिंदों के कलरव से एकजुटता और अपनेपन को प्रदर्शित करती है।

अलसुबह की भोर
हर रुत मे अपना भिन्न भिन्न रूप प्रदर्शित करती है
सर्दी में कठोरता, गर्मी में खुश्कता
बारिश में कोमलता और बसंत में मनमोहकता
प्रदर्शित करते हुए विभिन्नता में एकता का सन्देश देती है।

अलसुबह की भोर
सिर्फ और सिर्फ खुशनसीबों को ही नसीब होती है जो ब्रह्म मुहूर्त में जागते हैं
ये उन महानुभावों को नसीब नहीं होती
जो प्रकृति के नियमों को चुनौती देते हुए
निशाचरों की तरह रात भर जागते हैं और मध्यान्ह तक निद्रा में डूबे रहते हैं।

8. बचपन की बेफिक्री और भोलापन हिंदी कविता


न अपनो की चिंता, न परायों की फिकर
बात बात पर इठलाकर बातें मनवाने का हठ
भोलेपन और मासूमियत में पूछे गए अनगिनत सवाल
उत्तर न मिलने पर बारम्बार वही पूछने का खयाल
यही बचपन की बेफिक्री और भोलापन है।

छुप छुप कर घर से बाहर निकलकर मिट्टी में खेलना
कपड़े गंदे करके घर लौटकर माँ की डाँट खाना
वादा करना कि फिर ऐसा नहीं होगा लेकिन फिर वही करना
माँ का हर बार जानबूझकर नासमझ बनने का दिखावा करना
यही बचपन की बेफिक्री और भोलापन है।

तुतलाती आवाज में दोस्तों की शिकायत करके उन्हें चिढ़ाना
दोस्तों से रूठना और फिर अगले ही पल उनके साथ घुल मिलकर खेलना
अपनी माँ को दुनिया की सबसे अच्छी माँ बतलाना
माँ में ही, और माँ के ही इर्द-गिर्द, सारी दुनिया को समझना
यही बचपन की बेफिक्री और भोलापन है।

स्कूल न जाने के लिए ना ना प्रकार के बहाने बनाना
कभी सिरदर्द तो कभी पेट दर्द या कभी जीभ दिखलाना
नित्यकर्म के क्रियाकलापों में बेवजह अधिक समय लगाना
स्कूल के लिए देरी हो जाने के आखिरी कारण की पैरवी करना
यही बचपन की बेफिक्री और भोलापन है।

न धन का मोह और न माया का लालच
न कोई फिक्र और न ही कोई चाहत
कोई एक चाँकलेट दिला दे तो वो देवदूत समान सुहावना
अगर चाँकलेट नहीं दिलाये तो यमदूत समान डरावना
यही बचपन की बेफिक्री और भोलापन है।

न जात का पता न धर्म को जाने
हर इंसान को सिर्फ और सिर्फ इंसान माने
दोस्त ही दुनिया और खेल को ही सब कुछ माने
दोस्त के प्यार और दोस्ती को ही दिल पहचाने
यही बचपन की बेफिक्री और भोलापन है।

जब से बचपन बीता है अब तो ये आलम है
ऐसा लगता है कि दुनिया में फिर से नया जन्म लिया है
सभी लोग दुनियादारी सिखाने लगे हैं
जाति, धर्म, समाज, बिरादरी आदि के बारे में बतलाने लगे हैं
दुनिया के हिसाब से जीओगे तो समझदार नागरिक कहलाओगे
अगर अपने मन के हिसाब से जीओगे तो नासमझ बालक बन जाओगे
यही बचपन की बेफिक्री और भोलापन है।

9. प्रतिवर्ष हिंदी दिवस आता है हिंदी कविता


हिंदी दिवस के दिन न जाने क्यों हमारा हिंदी प्रेम उमड़ आता है
हर कोई अपने आप को हिंदी भाषा प्रेमी बतलाता है
अंग्रेजी को छोड़ हिंदी भाषा की श्रेष्ठता के गुण गाता है
सोशल मीडिया पर अपना हिंदी प्रेम दिखाता है
अगले दिन उसका हिंदी ज्ञान ना जाने कहाँ खो जाता है
हिंदी प्रेम प्रदर्शन के लिए प्रतिवर्ष हिंदी दिवस आता है।

फिर दस जनवरी को पुनः हिंदी भाषा को उसका गौरव दिलवाता है
बड़े जोर शोर से वह वर्ल्ड हिंदी डे यानि विश्व हिंदी दिवस मनाता है
सम्पूर्ण विश्व में एक दिन हिंदी भाषा का डंका जोर शोर से बजाता है
सभी को हिंदी भाषा का महत्व तथा उसकी समृद्धता के बारे में बताता है
आखिर वह हिंदी प्रेमी हैं इसलिए सोशल मीडिया पर पुनः अपने हथियार उठाता है
हिंदी प्रेम प्रदर्शन के लिए प्रतिवर्ष हिंदी दिवस आता है।

इन दो दिवसों के अतिरिक्त हम सभी ने हिंदी से मुँह मोड़ लिया
गुलामी की भाषा के यशोगान में मातृभाषा से नाता तोड़ लिया
भावनाओं का प्रस्तुतीकरण जो हिंदी में है उसे अनुभव करना छोड़ दिया
संस्कृत की बेटी को यथोचित मान न देकर भावनाविहीन भाषा से नाता जोड़ लिया
दिखावटी हिंदी प्रेम के प्रदर्शन के लिए हमें यह एक दिन बहुत भाता है
हिंदी प्रेम प्रदर्शन के लिए प्रतिवर्ष हिंदी दिवस आता है।

शायद ही विश्व में अन्य कोई मातृभाषा हो जिसके लिए कोई दिवस मनाते हों
शायद ही विश्व में अन्य कोई मातृभाषा हो जिसकी बदहाली पर आँसू बहाते हों
शायद ही विश्व में अन्य कोई मातृभाषा हो जो उसके जन्मदाता देश में उपेक्षित हों
शायद ही विश्व में अन्य कोई मातृभाषा हो जिसे बोलने वाले अशिक्षित समझे जाते हों
शायद इन्हीं वजहों से हिंदी दिवस तथा विश्व हिंदी दिवस का महत्व बढ़ जाता है
हिंदी प्रेम प्रदर्शन के लिए प्रतिवर्ष हिंदी दिवस आता है।

10. कहाँ है वो लड़की हिंदी कविता


कहाँ है वो लड़की?
जिसे ढूँढने को दिल चाहता है
जिसका दीदार करने की हसरत रहती है
जिससे बात करने का दिल करता है
जिसको मिलने को दिल मचलता है।

कहाँ है वो लड़की?
जिसे अपने दिल का हाल बताऊँ
जिसे प्यार की कविता सुनाऊँ
जिसे अपने दिल को चीरकर दिखाऊँ
जिसके साथ प्रेम बंधन निभाऊँ।

कहाँ है वो लड़की?
जिसके आने की खबर फिजा दे देती है
जिसके आने से माहौल खुशनुमा हो जाता है
जिसके आते ही संगीत बजने का अहसास होने लगता है
जिसके जाने पर पुष्प मुरझा जाते है।

कहाँ है वो लड़की?
जिसकी पवित्रता ओस की बूंदों सी लगती है
जिसकी कोमलता रंगबिरंगी तितलियों के माफिक है
जिसकी अल्हड़ता कलरव करते पंछियों की तरह है
जिसका शर्मीलापन छुईमुई की माफिक है।

कहाँ है वो लड़की?
जो बड़ी भोली भोली सी लगती है
जो निश्छल और मासूम प्रतीत होती है
जिसमें देवत्व का अहसास होता है
जो मन मंदिर ही मूरत सी प्रतीत होती है।

कहाँ है वो लड़की?
जिसके दो पल के साथ में ही उम्रभर की खुशी मिलती है
जिसके साथ को दिल हमेशा तड़पता रहता है
दिन तो क्या रात में भी जिसकी कल्पना रहती है
हर जगह दिल सिर्फ और सिर्फ उसे ही ढूँढ़ता रहता है।

कहाँ है वो लड़की?
जिसके साथ कहीं दूर किसी जजीरे पर जाने का दिल करता है
वहाँ जाकर प्राकृतिक सौन्दर्य के साथ उसके सौन्दर्य को तोलने का मन करता है
उसके साथ सूर्यास्त के सूरज को देखने का दिल करता है
जजीरे के एक एक पेड़ पर उसका नाम लिख देने को दिल करता है।

कहाँ है वो लड़की?
जिसके साथ तनहा किसी ऊँचे बर्फीले पहाड़ पर जाने का मन करता है
पहाड़ की ऊँचाई पर उसको मचलते हुए देखने का दिल करता है
जब पहाड़ पर आवारा बादल उसकी जुल्फों से टकरा कर खेलने लगे
तब उन आवारा बादलों को अपने हाथों से बिखराने का मन करता है।

कहाँ है वो लड़की?
जिसके साथ समुन्दर में किसी जहाज पर जाने का दिल करता है
समुन्दर में उसे इठलाते हुए देखने को दिल तरसता है
जब घनघोर घटा आसमान में उमड़ घुमड़ कर छा जाये
उस बारिश में उसके साथ भीगने को दिल करता है।

कहाँ है वो लड़की?
जिसको देखकर ये अहसास होने लगे
शायद हम दोनों जनम जनम के साथी है
प्यार की आग में जलकर रोशनी देने वाले
हम दोनों ही वो दीया और बाती है।

लेखक (Writer)

रमेश शर्मा {एम फार्म, एमएससी (कंप्यूटर साइंस), पीजीडीसीए, एमए (इतिहास), सीएचएमएस}

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डिस्क्लेमर (Disclaimer)

इस लेख में शैक्षिक उद्देश्य के लिए दी गई जानकारी विभिन्न ऑनलाइन एवं ऑफलाइन स्त्रोतों से ली गई है जिनकी सटीकता एवं विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। आलेख की जानकारी को पाठक महज सूचना के तहत ही लें। इसके अतिरिक्त इसके किसी भी उपयोग की जिम्मेदारी स्वयं उपयोगकर्ता की ही रहेगी।

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